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भारतीय संगीत के प्रचार प्रसार से जुड़ा रजिस्टर्ड NGO।स्कूली बच्चों में संगीत की जागरूकता के लिए ‘सुनेंगे तभी तो सीखेंगे’ अभियान। संपर्क raaggiri@gmail.com
नई दिल्ली, भारत
Joined March 2015
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जय जय जय माता दुर्गा भवानी…पंडित राजन-साजन मिश्र की अद्भुत प्रस्तुति। पंडित जी लोगों के गायन को थोड़ा ध्यान से सुनिए आप महसूस करेंगे कि यहां रटा-रटाया कुछ भी नहीं है… दरअसल गायन और राग का चिंतन एक साथ चल रहा है। विलक्षण
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नवरात्र चल रहे हैं तो माँ की भक्ति में डूबे पंडित जसराज जी को सुनिए।संगीत प्रेमी उन्हें रसराज कहते हैं।बहुत कम कलाकार ऐसे हैं जिनका संगीत आपको आध्यात्म से जोड़ सकता है,किसी दैवीय लोक में पहुंचा सकता है।संगीत मार्तंड पंडित जसराज ऐसे ही गायक हैं।
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वैसे तो पंडित भीमसेन जोशी को खयाल गायकी का स्कूल कहा जाता है। छात्रों को बताया जाता है कि राग की शुद्धता/रागदारी सीखना है तो उनको सुनो।लेकिन उन्होने कन्नड़, संस्कृत, हिंदी और मराठी में ढेरों भजन और अभंग भी गाए हैं जो बहुत ही लोकप्रिय हैं।
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सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके.
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते.
मॉं तुम सबके मंगल का मंगल हो। मंगलमय की केन्द्रभूत शक्ति हो।शिवा हो। शिवत्व को सक्रिय करने वाली हो। सभी पुरुषार्थों की साधिका हो 🙏
पंडित छन्नूलाल मिश्र को सुनिए
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रागगीरी की तरफ से सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएँ। माँ से प्रार्थना है कि आप सभी के जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि रहे।
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1998 में सई परांजपे की फिल्म ‘साज़’ में उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने भी संगीत पक्ष संभाला था।गुनगुनाया भी था। लेकिन यहां वो व्यवस्थित तौर पर गा रहे हैं।तबले पर सुरेश वाडेकर जी हैं।श्रोताओं में @Shankar_Live जी हैं। ऐसे दुर्लभ कार्यक्रम कम ही होते हैं।
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कबीर ने लिखा- हमन है इश्क मस्ताना। कहते हैं इसी से प्रभावित होकर निदा फ़ाज़ली साहब ने लिखा- होश वालों को ख़बर क्या… पहले भूपिंदर सिंह को इसे गाना था फिर जगजीत सिंह ने गाया। संगीत जतिन ललित का था। ये अमर संगीत है।
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विदुषी एमएस सुब्बुलक्ष्मी-पं. जसराज।दोनों संगीत के परम साधक।विलक्षण कलाकार।साक्षात ईश्वरीय व्यक्तित्व
इन दोनों कलाकारों ने हिंदुस्तान की संस्कृति-संगीत को पूरी दुनिया में विस्तार दिया।ऐसे कलाकारों के बारे में हमारी आज की पीढ़ी को बताना जरूरी है।
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लियोनार्डो विंची कहते थे-आसान होना सबसे कठिन है। करीब 60 साल पुराने जिस गाने को प्रियंका बर्वे-राहुल देशपांडे जी गा रहे हैं उस पर यही बात लागू है।साहिर की सरल-सहज कलम, LP के संगीत का जादू,रफ़ी-लता जी की मीठी आवाज़
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मोहिनीअट्टम केरल का शास्त्रीय नृत्य है।कहते हैं कि समुद्र मंथन में जब असुरों को अमृत मिल गया तो भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धरकर असुरों के बीच से अमृत चुराकर देवताओं को दिया।इसी प्रसंग से इस नृत्य का नाम मोहिनीअट्टम पड़ा
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जेपी दत्ता फिल्म निर्देशन की दुनिया का बड़ा नाम हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत फिल्म ग़ुलामी से की थी। इस फिल्म में संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था। गुलज़ार साहब ने गीत लिखे थे। ये गाना अब भी कदम रोक देता है।
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1988 में दूरदर्शन पर मिर्ज़ा ग़ालिब का प्रसारण किया गया। इस सीरियल के ज़रिए शेरो-शायरी की शाही महफ़िलों का अंदाज़ लोगों की समझ में आया। गुलज़ार साहब, नसीरूद्दीन शाह, जगजीत-चित्रा सिंह की जोड़ी। सब कुछ चार दशक बाद भी ठहर कर देखने और सुनने वाला
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पूर्णिमा भट्ट कुलकर्णी जी ने 10-12 साल की उम्र में संगीत सीखना शुरू किया। उषा दतार जी शुरुआती गुरू थी। इसके बाद पद्मभूषण पंडित बसवराज राजगुरु और कुसुम शेंडे जी का आशीर्वाद मिला। पूर्णिमा जी मराठी संगीत का भी जाना माना नाम हैं। राग देवगंधार सुनिए
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एक सच्चा कलाकार हमेशा दूसरे कलाकार की दिल से इज्जत करता है।उसे अच्छी तरह पता होता है कि सामने वाला कलाकार जो भी गा-बजा रहा है उसके पीछे कितना रियाज और साधना है।इस बात का अहसास करने के लिए उस्ताद ज़ाकिर हुसैन-पंडित राकेश चौरसिया की जुगलबंदी देखिए
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विमल रॉय भारतीय फ़िल्म जगत के महानतम निर्देशकों में शुमार हैं।दुर्भाग्य से उनका निधन असमय हुआ था। सिर्फ 55-56 साल की उम्र में वो जो फिल्में बना गए वो फिल्में और उनका संगीत अमर हैं।सलिल दा का संगीत लता जी की आवाज-आ जा रे मैं तो कब से खड़ी इस पार
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विदुषी किशोरी अमोनकर जी ने मां मोगूबाई की इच्छा के मुताबिक संगीत का हर पहलू सीखा- क्लासिकल, सुगम संगीत, मराठी गाने, भजन।मां के अलावा उन्होंने उस्ताद अनवर हुसैन खां,पंडित बालकृष्ण बुआ,मोहन रावजी पालेकर, शरतचंद्र आरोलकर औरअंजनीबाई से भी तालीम ली।
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परवीन सुल्ताना जी भारतीय शास्त्रीय संगीत की बड़ी पहचान हैं।पटियाला घराने की गायकी को उन्होंने विस्तार दिया।उपशास्त्रीय संगीत और चुनिंदा फिल्म गायन में भी उन्हें श्रोताओं का खूब प्यार मिला है।6 दशक से भी ज्यादा की साधना है।
सौजन्य @darbarfestival
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संगीत अथाह सागर है।जब सारी कहानी सिर्फ सात सुरों की है तो ऐसा क्यों कहा जाता है?ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन सात सुरों को लेकर कलाकार की सोच और उसकी उपज संगीत रसिकों को अनंत यात्रा पर ले जाती है।पंडित अजय चक्रवर्ती को सुनिए ये बात समझ आएगी।
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पं. शरत चंद्र श्रीवास्तव जाने माने वॉयलनिस्ट हैं। नाना पं. जोई श्रीवास्तव ने तालीम दी है। नाना जी ने उस्ताद अलाउद्दीन खान से सीखा था। शरत जी के बेटे राघव भी इस परंपरा को बढ़ा रहे हैं। श्रोताओं की फरमाइश पर उन्होंने नौशाद साहब को याद किया। सुनिए
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मन्ना दा बेमिसाल गायक थे। उनके सैकड़ों गाने अमर हैं। उनकी गायकी की विविधता या ‘रेंज’ विलक्षण थी। उस दौर में संगीतकारों को शास्त्रीय संगीत की जमीन पर कोई गाना तैयार करना हो तो मन्ना दा उनकी पहली पसंद होते थे- लागा चुनरी में दाग ❤️
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सौ- @abpanandatv
