
Gorakhpur president:- Ghause Azam Foundation (GAF) NGO | Social worker | Follow: @SameerAli91 Follow our NGO Twitter account 👉 @GAF_NGO
Joined July 2020
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*15 नगर निगम के कर्मचारियों के सहयोग से, ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के तत्वावधान में, 11वीं शरीफ़ के मद्देनज़र, उद्योग नगर पार्क की, सुबह से साफ़ सफाई हो रही है। अभी दोपहर के 2:18 मिनट हो चुके हैं। शाम तक पार्क का रंग ही बदल जाएगा।*
*मैं सिर्फ ज़ोहर की नमाज़ पढ़ने अपने घर गया था। सुबह से पार्क में ही मौजूद हूं। इस पार्क में और भी बहुत काम पहले करवा चुका हूं। आज बिजली विभाग से कनेक्शन के लिए भी आवेदन पत्र जमा करवा दिया है।*
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महोदय,
#नाजिया_इलाही_खान द्वारा पिछले कुछ सालों से लगातार हेट स्पीच के द्वारा इस्लाम/ मुसलमान/ पैग़म्बर आदि पर आपत्तिजनक कॉमेंट हो रहे हैं और धार्मिक भावनाओं को आहत किया जा रहा है।
हमारे लेटरहेड पर लिखी शिकायत पर तुरंत नाजिया इलाही खान पर कार्रवाई करें
@Rajeev_ips
@PoliceRajasthan
@RajPoliceHelp
@jaipur_police
@RajCMO
@BhajanlalBjp
@RajGovOfficial
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An FIR has been registered in Mumbai by #RazaAcademy against #NaziaIlahi for blasphemous remarks on the Holy Prophet of Islam.
#ArrestNaziaIlahi
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An FIR has been registered against #NaziaIlahi in Bhiwandi, Maharashtra for blasphemous remarks on the Holy Prophet of Islam.
#ArrestNaziaIlahi
#RazaAcademy
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*हर साल की तरह इस साल भी,*
*GHAUSE AZAM FOUNDATION*
*की जानिब से*
*"शहीदाने करबला" की याद में,*
*नेकियों के कामों को अंजाम दिया जा रहा है*
गौसे आज़म फाउंडेशन की जानिब से अहले वतन को ईद उल अज़हा मुबारक हो
@SameerAli91
#عيد_الأضحى
#Eid_ul_adha
@AIMIMupdate @Allah_Ki_Talwar @GAF_NGO @SADDAMGAF
2nd FEBRUARY
CELEBRATING 5TH FOUNDATION DAY OF GAF
@Allah_Ki_Talwar @azizkavish @CommonBS786OM @GAF_NGO
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*ग़ौसे आज़म फाउंडेशन का स्थापना दिवस, 5 साल: ख़िदमत, इंसानियत और मोहब्बत की ऐतिहासिक यात्रा*
सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त समाजसेवी संस्था ग़ौसे आज़म फाउंडेशन ने अपना स्थापना दिवस पूरे जोश, जज़्बे और इंसानियत के साथ मनाया। बीते पांच वर्षों में फाउंडेशन ने समाज के उस तबक़े तक राहत पहुंचाई, जहां अक्सर निगाहें नहीं जातीं। भूखे, ग़रीब, बेसहारा और हक़ीक़ी ज़रूरतमंद।
ग़ौसे आज़म फाउंडेशन आज सिर्फ़ एक एनजीओ नहीं, बल्कि देश में प्यार, मोहब्बत और इंसानियत की गंगा बहाने वाला एक मज़बूत सामाजिक आंदोलन बन चुका है। बिना किसी भेदभाव के, फाउंडेशन ने खाने, शिक्षा, इलाज और आपात राहत के ज़रिए हज़ारों ज़िंदगियों में उम्मीद की रौशनी जगाई है।
स्थापना दिवस के अवसर पर भी जश्न को दिखावे में नहीं, बल्कि ख़िदमत में बदला गया। आज की रात ग़ौसे आज़म फाउंडेशन की ओर से ग़रीबों और हक़ीक़ी ज़रूरतमंदों में खाना वितरित किया गया, ताकि कोई इंसान भूखा न सोए।
यह सेवा कार्य ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब के स्पष्ट दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। उनकी यही सोच है कि “ असली दिली सुकून तो तब है, जिसमें इंसान के काम इंसान आए। ”
खाना वितरण का यह मानवीय अभियान गोरखपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चलाया गया, जिनमें गोरखनाथ, रेलवे स्टेशन परिसर, बैंक रोड, काली मंदिर क्षेत्र सहित अन्य स्थान शामिल रहे। इन इलाक़ों में रात के समय ज़रूरतमंदों तक सीधे पहुंचकर सम्मान के साथ भोजन कराया गया।
इस सेवा अभियान में ग़ौसे आज़म फाउंडेशन, गोरखपुर के सदर/अध्यक्ष, समीर अली, रहमतनगर अध्यक्ष मोहम्मद फैज, साथ ही रियाज़ अहमद, अमान, अहमद, मोहम्मद शारिक, फरहान हुसैन, मोहम्मद ज़ैद क़ादरी सहित फाउंडेशन के अन्य समर्पित सदस्यगण उपस्थित रहे।
इन सभी ने मिलकर यह साबित किया कि
ख़िदमत किसी शोहरत की मोहताज नहीं होती, जब नियत साफ़ हो तो काम खुद बोलता है।
ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के पांच साल ख़ामोश सेवा से बुलंद पहचान तक की वह कहानी हैं, जिसने समाज में यह भरोसा पैदा किया है कि आज भी इंसानियत ज़िंदा है। फाउंडेशन आने वाले समय में और भी व्यापक स्तर पर समाज सेवा, राहत और सशक्तिकरण के कार्यों को अंजाम देगा।
*ग़ौसे आज़म फाउंडेशन*
*Service • Humanity • Love*
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*बच्चों की पिटाई ज़रूरी है?*
ताअ़लीम, तरबियत या तशद्दुद…?
*LIVE Reading | नूरी जामा मस्जिद*
बच्चों की पिटाई कोई तरबियत नहीं,
बल्कि अक़्सर बच्चों के दिल व दिमाग़ में
डर, बग़ावत और नफ़रत पैदा कर देती है।
इस्लाम ने तालीम के साथ
रहमत, हिकमत और मोहब्बत सिखाई है,
ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं।
आज ज़रूरत है कि हम
बच्चों को मार कर नहीं,
समझा कर, सुन कर और संभाल कर पढ़ाएं और आगे बढ़ाएं।
आइए, क़ुरआन व सुन्नत,
अक़्ल और तजुर्बे की रोशनी में
इस अहम मौज़ू पर ग़ौर करें।
*सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
चेयरमैन : ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
📞 9358649187
*📢 Share This Video — हर घर तक यह पैग़ाम पहुँचे*
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मुझे बहुत डर लग रहा है 😢
मैं एक महिला हूँ और शांति से अपना छोटा सा इत्र का काम कर रही हूँ।
न मैंने किसी से झगड़ा किया, न किसी को कुछ कहा।
इसके बावजूद एक पुलिसकर्मी की भाषा बहुत गंदी और डराने वाली थी।
ऐसी भाषा किसी के लिए भी सही नहीं है, खासकर एक महिला के लिए।
मैं बस सम्मान और सुरक्षा चाहती हूँ।
कृपया इस बात पर ध्यान दिया जाए।
.@Uppolice
.@myogiadityanath
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*कड़ाके की ठंड में इंसानियत की गरमाहट: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने ज़रूरतमंदों में बांटा कंबल*
* *गोरखपुर की सड़कों पर मानवता का पैग़ाम — राहगीरों, फुटपाथ पर सोने वालों और बेसहारा लोगों के बीच जीएएफ़ का राहत अभियान*
#गोरखपुर।
कड़ाके की ठंड को देखते हुए ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन (जीएएफ़) टीम ने एक सराहनीय मानवीय पहल करते हुए शहर के विभिन्न इलाक़ों में जाकर राहगीरों, सड़क किनारे सोने वाले और ज़रूरतमंद लोगों के बीच कंबलों का वितरण किया। इस राहत अभियान के दौरान जीएएफ़ टीम ने न सिर्फ़ कंबल बांटे बल्कि बेसहारा लोगों से दुआएं भी हासिल कीं।
इस अवसर पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के ज़िला अध्यक्ष समीर अली ने कहा कि इस वर्ष ठंड का प्रकोप अत्यधिक है, जिससे सड़क किनारे जीवन गुज़ारने वाले और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन, हर साल दिसंबर और जनवरी की सर्दियों में कंबल, गर्म कपड़े आदि बांटता है और हमेशा मानव सेवा को अपना मूल उद्देश्य मानता है क्योंकि ज़रूरतमंदों के साथ खड़े रहना ही सच्ची समाजसेवा है।
समीर अली ने समाज के सक्षम वर्ग से अपील करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपने आसपास मौजूद ज़रूरतमंदों तक गर्म कपड़े और कंबल अवश्य पहुंचाने चाहिए, ताकि इस कड़ाके की ठंड में वे भी सम्मान के साथ अपना जीवन यापन कर सकें।
कंबल वितरण अभियान को सफल बनाने में जीएएफ टीम के सदस्यों, अमान अहमद, रियाज़ अहमद, मोहम्मद ज़ैद, अनवर अली आदि की सक्रिय और सराहनीय भूमिका रही।
ग़ौरतलब है कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन समय-समय पर सामाजिक, शैक्षणिक और मानवीय गतिविधियों के माध्यम से समाज के कमज़ोर तबक़े की मदद करता रहा है और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा।
शुक्रिया मीडिया साथियों
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Gorakhpur News- ग़ौसे आज़म फाउंडेशन ने लगाया निःशुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर
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*उर्स ए ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ पर ग़ौसे आज़म फाउंडेशन 28 दिसम्बर इतवार को दोपहर 12 से 2 बजे तक ग़ौसिया जामा मस्जिद, जामियानगर, गोरखनाथ, गोरखपुर में लगाएगा निःशुल्क स्वास्थ जांच शिविर
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समाज के सक्षम और ज़िम्मेदार हज़रात, इमामों और उस्तादों की ताज़ीम, देखभाल और उनकी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आगे आएं : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी, चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन
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*लिव-इन को खुली आज़ादी, शादी पर उम्र की बेड़ी — सामाजिक संतुलन तोड़ने वाले क़ानून पर सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी का तीखा सवाल*
*जब बालिग़ों को लिव-इन की इजाज़त है, तो उसी उम्र में निकाह और विवाह पर क़ानूनी बंदिशें क्यों बरक़रार हैं?*
ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना क़ाज़ी सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह-उम्र के विरोधाभास पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि आज “बिना ज़िम्मेदारी वाले रिश्तों” को आसान और “ज़िम्मेदार रिश्तों” को मुश्किल बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जब क़ानून दो बालिग़ों को साथ रहने और शारीरिक संबंध बनाने की अनुमति देता है, तो उसी उम्र में निकाह/ विवाह पर रोक समाज और परिवार — दोनों के लिए हानिकारक है।
क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब के अनुसार एक तरफ़ लिव-इन जैसे बंधनरहित रिश्तों को वैध और संरक्षित दर्जा मिल रहा है, वहीं निकाह/ शादी जैसे स्थिर और जवाबदेह रिश्तों पर उम्र की सख़्त पाबंदियां लगी हुई हैं। यह दोहरा मापदंड युवाओं को अस्थिर और असुरक्षित रिश्तों की ओर धकेलता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भरोसे और परवरिश का संकट पैदा कर सकता है।
*राजस्थान हाईकोर्ट के फ़ैसले का संदर्भ*
सूफ़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया आदेशों की ओर इशारा किया, जिनमें सभी लिव-इन रिश्तों के पंजीकरण और अनुबंध की व्यवस्था तथा बालिग़ (अठारह वर्ष से ऊपर) व्यक्तियों को, भले वे विवाह-उम्र तक न पहुंचे हों, लिव-इन में रहने की अनुमति पर ज़ोर दिया गया है। उन्होंने कहा कि संविधान और न्यायपालिका का सम्मान अनिवार्य है, लेकिन कोई भी आदेश हराम को हलाल और नैतिक रूप से संदिग्ध चलन को सामाजिक मानक नहीं बना सकता। क़ाज़ी सैफुल्लाह क़ादरी साहब ने पूछा कि जब अदालतें लिव-इन के लिए अलग रजिस्ट्रेशन और सुरक्षा तंत्र बना रही हैं, तो उसी गंभीरता से निकाह/ विवाह की उम्र और नियमों की समीक्षा क्यों नहीं की जा रही। “अगर राज्य सचमुच महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा चाहता है, तो उसे सबसे पहले स्थिर, क़ानूनी रूप से संरक्षित परिवार को मज़बूत करना होगा, न कि अस्थिर व्यवस्थाओं को आसान बनाना”।
*शरीअत और सामाजिक दृष्टिकोण*
क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने कहा कि इस्लामी शरीअ़त निकाह को पवित्र, सुरक्षित और जवाबदेह रिश्ते का रास्ता मानती है और हर उस चलन का विरोध करती है जो युवाओं को बे-ज़िम्मेदारी और नैतिक गिरावट की ओर ले जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी अदालत या सरकार से नहीं, बल्कि उन व्यवहारों से है, जो पति-पत्नी और बच्चों की इकाई को कमज़ोर करते हैं और समाज की नैतिक रीढ़ पर चोट पहुँचाते हैं।
*ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन की अपील*
ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की है कि जिन बालिग़ युवाओं को क़ानून लिव-इन की खुली अनुमति देता है, उन्हें उसी उम्र में निकाह/विवाह की भी स्वतंत्रता और क़ानूनी सुरक्षा दी जाए। फ़ाउंडेशन का मानना है कि यदि 18 वर्ष के युवा अपने जीवन के बड़े फ़ैसले लेने में सक्षम माने जाते हैं, तो उन्हें स्थायी पारिवारिक ढांचा चुनने से रोकना न्यायसंगत नहीं है। संस्था ने सुझाव दिया कि विवाह-उम्र से जुड़े क़ानूनों की समीक्षा कर, ऐसी नीतियां बनें जो युवाओं को ग़ैर-ज़िम्मेदार रिश्तों की बजाय पंजीकृत, सुरक्षित और जवाबदेह निकाह/ विवाह की तरफ़ प्रोत्साहित करें, साथ ही जागरूकता और काउंसलिंग कार्यक्रमों को बढ़ाया जाए।
क़ाज़ी सैफ़ुल्लाह क़ादरी ने अंत में कहा कि ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन हर उस दिशा का समर्थन करेगा, जो समाज को स्थिरता, सुरक्षा और ज़िम्मेदारी की ओर ले जाए और हर उस रुझान का विरोध करेगा, जो युवाओं को हरामकारी और नैतिक गिरावट की तरफ़ ले जाता है।
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