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साहित्य:समाज और संस्कृति (रचनाएँ भेजें:- [email protected] )

वाराणसी
Joined March 2019
मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय। फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥
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विश्व तुम्हारा बाहुबल नहीं, बल्कि नीरव आश्वासन और सुकुमार हृदय की शक्ति का निर्झर विश्वास ही चाहता है।
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सब जख्म खुद भरेंगे , भरेगा कोई नहीं, मरने से पहले कद्र करेगा कोई नहीं, और तलवार अगर हवा में चलाओगे खामखां, बाजू थकेंगे और मरेगा कोई नहीं।
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राज्य सत्ता प्रजातंत्र का प्रजापति है और प्रजा अगर ‘तंत्र’ से टकराती है कभी तो तंत्र की हिफ़ाज़त में तैनात बन्दूक की नाल से बोलती है राज्य सत्ता कि सुनो मेरी प्यारी-प्यारी प्रजा तुम्हें तंत्र के भीतर ही प्रजा होने का हक है। -उदय प्रकाश
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उसने बेटे से कहा "बेटा घड़े में पानी नहीं" बेटा जल्दी में था, उसने सुना नहीं। उसने बहू से कहा, “बहू एक गिलास पानी।" बहू ने सुना, पर रुकी नहीं। उसने पोते से कहा, “मुन्ने देना तो पानी।" पोता देखता रहा टी.वी., हिला नहीं। उसने नौकर से कहा, "रामू.........पानी" नौकर बाहर लपका, उसको सब्जी लानी थी। यों घटने लगा घरों के नलों में घड़ों में, आँख में पानी। -सुनीता जैन
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आम स्त्रियों में पाई जाने वाली विशिष्ट प्रवृत्तियाँ और चारित्रिक दुरूहताएँ उन हालात का परिणाम होती हैं, जिनमें उनका पालन-पोषण होता है—ये प्राकृतिक क़तई नहीं होतीं। -जॉन स्टुअर्ट मिल
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तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर॥
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जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा तुम्हारे हाथ आया। बहुत उसे उलटा-पलटा- उसमें कुछ न था- तुमने उसे फेंकदिया : तभी जाकर मैं नीचे पड़ा हुआ तुम्हें 'मैं' लगा। तुम उसे उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे यों ही मिल लिया था। -शमशेर बहादुर सिंह
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अपने देश का क़ानून पक्का है— जैसा आदमी, वैसी अदालत। -श्रीलाल शुक्ल
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सौ मिलीं ज़िंदगी से सौग़ातें, हम को आवारगी ही रास आई। -अली सरदार ज़ाफरी
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अदब और क़ायदे आदमी को बहुत जल्दी कायर बना देते हैं। ऐसा आदमी झगड़ा नहीं करता। -विनोद कुमार शुक्ल
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जो रहीम उतम प्रकृति, का करि सकत कुसंग। चन्दन विष व्यापै नहिं, लिपटे रहत भुजंग॥
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जीवन बकवास था। प्यार भी बकवास था।
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सच है हमारे लिए भी कल्पनाओं के आश्रम खुले हैं किंतु चौंकाती नहीं हैं दुर्घटनाएँ कितना स्वीकार्य और सहज हो गया है परिवेश कि सत्य चाहे नंगा हो कर आए, दीखता नहीं है। -दुष्यंत कुमार
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संसार का तो कहना ही क्या, स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज्य है। न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।
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अब सब कुछ मूर्त होगा क्योंकि अमूर्तन की भाषा में बहुत समय तक नहीं हो सकती है कविता
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कबीर कड़ई बेलड़ी, कड़वा ही फल होइ। साँध नाँव तब पाइए, जे बेलि बिछोहा होइ॥
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पिंजड़े में बंद परिंदे, आज़ाद पक्षी को घायल होते देखकर बड़े प्रसन्न होते हैं, क्योंकि उनकी घुटन से उत्पन्न हीनता की भावना को शांति मिलती है। -हरिशंकर परसाई
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सांस्कृतिक अस्मिता नक़ल से नहीं बनती, विदेशी मनोवृत्तियाँ और मनोभाव आयातित करके भी नहीं बनती, अपनी ही सही पहचान से बनती है। सांस्कृतिक जीवन के बारे में ही यह बात सबसे अधिक सत्य है कि 'हम वही बन सकते हैं जो हम हैं ।' -अज्ञेय
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जो पुण्य करता है वह देवता बन जाता है, जो पाप करता है वह पशु बन जाता है, और जो प्रेम करता है वह आदमी बन जाता है। ~गोपालदास नीरज
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