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वैदिक काल,
1500 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व तक था,
ब्राह्मणों ने इस समय अनेको खोज किए।
दुनिया को ज्ञान भी दिए,
वैदिक काल को 2 भागों में बांट दिया गया है।
ऋग्वेदिक काल और उतरवैदिक काल,
ब्राह्मणों ने ऋग्वेदिक काल मे अनेको खोज किए।
कृषि करना शुरू किए
धातुओ का ज्ञान हुआ
संगीत और मंत्र का ज्ञान
चिकित्सा का ज्ञान ये सब ब्राह्मणों ने खोज किए थे,
उतरवैदिक काल मे भी ब्राह्मणों ने बहुत सारी चीजों का खोज किया था अगले पोस्ट मे उसे मेंशन करूंगा।
कुमार विश्वास को निराला और दिनकर के समकक्ष रखने का काम वही इंसान कर सकता है, जिसने कभी इन दोनों को पढ़ा नहीं या मानसिक स्थिति खो बैठा है, जिसे गोबर का उपला भी केक नज़र आ रहा है।
एक ‘मसखरे विदूषक’ की ऐसी कौन सी रचना इन्होंने पढ़ ली जो उसकी तुलना ‘राम की शक्ति पूजा’ और रश्मिरथी जैसी कालजयी रचनाओं से कर दी है इस मूर्ख ने ?
क्या किसी भी साधारण व्यक्ति को @DrKumarVishwas की चार लाइन “कोई दीवाना कहता है…के अलावा कुछ भी याद है ? क्या बिना सर्च करे कोई उनकी एक भी किताब का नाम बता सकता है, इतना सोशल मीडिया और पीआर होने के बाद कोई मुझे इनकी अपनी कोई 8-10 लाइन की दूसरी कविता सुना सकता है ? ये एक घंटे के शो की लाइव बकैती में 80 % इधर उधर से दूसरे कवियों की पंक्तियां उठाकर अपना बीच बीच में कुछ बोलकर निकल लेते है भाई। इसका मुझे लाइव एक घंटा दिखा दे जिसमे सिर्फ अपना कुछ बोला हो।
भाई मोमोज को फ्राई करने या उसमे कुछ एक्स्ट्रा पनीर डाल देने से वो नई रेसिपी नहीं बन जाती, ये यही करते है, पहले से तैयार रेसिपी में कुछ इधर उधर से टोमेटो केचप, कुछ चाट मसाला डालकर उसको किसी मंच रूपी प्रेशर कुकर में चढ़ा कर सीटी लगाते रहते है।
और भाई ‘रश्मिरथी’ का नाम मत ले इसके सामने तुझे कुछ नहीं पता सच में, ये मान कर चल साहित्यक दुनिया का मास्टरपीस है ये कृति। 🙏
आदरणीय युगकवि @DrKumarVishwas की रचना पर प्रश्नचिह्न उठाने का साहस करने वाले, @ajeetbharti @manojmuntashir पहले यह तो बताइए कि महाप्राण निराला की ‘राम की शक्ति-पूजा’ से लेकर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी’ तक, क्या आपने कभी काव्य की उस ऊँचाई को स्पर्श किया है, जहाँ शब्द केवल शब्द नहीं रहते, युग की चेतना बन जाते हैं?
‘मंगल रंग’ जैसे गीत की आलोचना करने से पहले उसके भावबोध, सांस्कृतिक चेतना और काव्यात्मक अभिव्यक्ति को समझने का प्रयास कीजिए। किसी रचना से असहमति आपका अधिकार है, किंतु अपनी रुचि को ही साहित्य का अंतिम प्रतिमान मान लेना और एक युगकवि की सृजनशीलता पर प्रश्न उठाना आपकी सीमित दृष्टि का परिचायक है।
राष्ट्र, संस्कृति और आस्था के भावों को गीत में पिरोने का प्रयास हो, तो उसका मूल्यांकन भी समग्रता में होना चाहिए, न कि पूर्वाग्रह के चश्मे से।
महाप्राण दिनकर की ‘रश्मिरथी’ में कर्ण की हुंकार देखिए—
“याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।
टकराएँगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा।”
इन पंक्तियों की शक्ति केवल शब्दों में नहीं, उस भावभूमि में है जो शब्दों को युगध्वनि बना देती है। ठीक इसी प्रकार ‘मंगल रंग’ का मूल्यांकन भी उसके संपूर्ण भाव, संदर्भ और अभिव्यक्ति के आधार पर होना चाहिए।
आदरणीय युगकवि डॉ. कुमार विश्वास जी,
की लेखनी पर प्रश्न उठाने से पहले, अपनी आलोचना की पात्रता तो सिद्ध कीजिए!
काव्य का मूल्यांकन तर्क से होता है, अहंकार से नहीं; और साहित्य में प्रतिष्ठा शोर मचाने से नहीं, सृजन से अर्जित होती है। आलोचना कीजिए, अवश्य कीजिए—पर इतनी उदारता और साहित्यिक विवेक के साथ कि असहमति के बीच भी सृजन का सम्मान बना रहे।
#कुमारविश्वास #मंगलरंग #रश्मिरथी
@Shivangkaushik3
चल भाई तू भी रहने दे …😂😂
बस उसमे और तुम्हारी वाली में कचरे और गोबर का फ़र्क़ है। इसमें भी रामायण का कोई भी स्तर नहीं, भाई तुम नेताओ के लिए ठुमरियाँ गाओ, ये सब तुम्हारे बस की नहीं..🙂👇
एक मंगल रंग मैंने भी बनाया है
रामायण फ़िल्म का राम विवाह सुना तो लगा एक मुझे भी बनाना चाहिए
आप सब भी सुरना और बताए कैसा है
जय श्री राम
@arrahman sir आप तो सूर्य है एक छोटा सा दीपक मैंने गाया और लिखा और कंपोज़ किया है जरूर सुनिएगा
राम सिया राम ..राम सिया राम ..सिर्फ़ इस धुन की वजह से वो गाना लोग सुनते है। और ये तुमने बनाई है ? 😅 ये भी अपना बता रहा, क़सम से बड़ा बेशर्म आदमी है।
पूरे गाने में ऊपर की 4 लाइन छोड़कर तुम्हारा है क्या ? 80 % तो सब पहले की पारंपरिक चौपाई है मानस की। उसको भी अपना बना दोगे अब ?
हरि अनंत, हरि कथा अनंता
कहहिं-सुनहिं बहुबिधि सब संता
राम-रतन धन जो कोई पाए
जीवन-भर रामायण गाए
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी।
इसमें तुम्हारा क्या है ? ये सब चौपाई सालों से गाते आ रहे है। इस गाने की चौपाई तुम्हारी नहीं, धुन तुम्हारी नहीं, संगीत तुम्हारा नहीं, आवाज़ तुम्हारी नहीं। तुम्हारा काम था लिखना उसमे भी सिर्फ 4 लाइन है,
हो जनम-जनम की खोज बताए, राम से चल के राम पे आए,
ये लाइन भी मानस में ऐसे आती है मिलती जुलती…जनम जनम मुनि जतन कराहीं, अंत राम कहि आवत नाही।
ये भी पूरी मूलतः नहीं लगती ख़ुद से बनाई। 👇👇🙂
मनोज मुंतशिर वाला कारनामा?
बड़ी जाहिलों जैसी बात की है देश के स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ चैनल ने.
मेरे भाई काश रामायण के गीतों में मेरा वाला कारनामा दोहराया जाता.
आदिपुरुष बहुत ख़राब फ़िल्म थी, संवाद और भी ख़राब थे, लेकिन गीत तो देश का बच्चा-बच्चा गाता है.
कभी जाइए श्री अयोध्या पूरी, गली-गली में आदिपुरुष के ही गीत बज रहे होते हैं.
जो ग़लती मुझसे हुई, मैंने उसके लिए अनगिनत बार रामभक्तों से क्षमा माँगी और क्षमा मिली भी, लेकिन गीतों को चैलेंज मत करिए.
उनमें श्रद्धा, समर्पण और कवित्त की कोइ कमी नहीं थी.
न मैंने राम के लिए नर्सरी राइम्स लिखी न कव्वालियाँ.
आगे लोग समझदार हैं, जानते हैं कौन कितने पानी के है.
जय श्री राम.
तुमने पूर्वांचल के लोक शायर रफ़ीक सदानी की कविता ‘जियो बहादुर खद्दरधारी’ को ‘जियो तिवारी जनेऊधारी’ बना दिया था धूर्त चोर। और उनको कोई क्रेडिट नहीं दिया। इसके लिए भी माफ़ी माँग ..
और क्रांतिवीर चंद्र शेखर आज़ाद जिन्होंने सबके सामने अपना सरनेम हटाकर अपना नाम आज़ाद बताया, 15 कोड़े मारे जाने के बाद भी जो अपना नाम आज़ाद बताते रहे। जो भगत सिंह के साथ कम्युनिस्ट संगठन HSRA के संथापक थे,जो ख़ुद को जाति धर्म से ऊपर मानते थे। उन महान क्रांतिकारी को इसने अपनी जाति गर्वित क्षुधा शांत करने के लिए,उनको तिवारी जनेऊधारी बोलकर एक जाति के साँचे में समेट दिया। कल को ये महात्मा गांधी को ..
देखो देखो दुनिया ..आ गया मोहनदास बनिया …या फिर बोल जवाहर बोल ..आ गए पंडित कौल….
देखो देखो ठाट..जय जय भगत जाट …
इस तरह की तुकबंदियाँ चुराकर, सबको जाति के सांचो में डाल कर उनके क़द को अपने जैसा मनोज मुंतशिर से फिर जाति लगाकर शुक्ला बनाना चाहता है। 👇👇👇
मनोज मुंतशिर वाला कारनामा?
बड़ी जाहिलों जैसी बात की है देश के स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ चैनल ने.
मेरे भाई काश रामायण के गीतों में मेरा वाला कारनामा दोहराया जाता.
आदिपुरुष बहुत ख़राब फ़िल्म थी, संवाद और भी ख़राब थे, लेकिन गीत तो देश का बच्चा-बच्चा गाता है.
कभी जाइए श्री अयोध्या पूरी, गली-गली में आदिपुरुष के ही गीत बज रहे होते हैं.
जो ग़लती मुझसे हुई, मैंने उसके लिए अनगिनत बार रामभक्तों से क्षमा माँगी और क्षमा मिली भी, लेकिन गीतों को चैलेंज मत करिए.
उनमें श्रद्धा, समर्पण और कवित्त की कोइ कमी नहीं थी.
न मैंने राम के लिए नर्सरी राइम्स लिखी न कव्वालियाँ.
आगे लोग समझदार हैं, जानते हैं कौन कितने पानी के है.
जय श्री राम.
‘तेल तेरे बाप का जलेगी तेरे बाप की’ जैसे कालजयी संवाद किसके आदेश पर लिखा था? या ये भी किसी का चुराया था चोट्टे?
@manojmuntashir ये दुनिया का सबसे बड़ा छापा फैक्ट्री है, इसने नुसरत फतेह अली ख़ान जैसे कई पाकिस्तानी कलाकारों के गाने इधर उधर से कॉपी पेस्ट मारकर अपने लिए नए कपड़े सिला लिए।
एक पूर्वांचल के शायर रफ़ीक सदानी की कविता ‘जियो बहादुर खद्दरदारी’ को इसने ब्राह्मण इमेज चमकाने के लिए क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद को ‘जियो तिवारी जनेऊधारी’ बना दिया। जिस महान क्रांतिकारी ने सबके सामने जाति को ख़त्म कर अपना सरनेम आज़ाद रखा, और 15 कोड़े अंग्रेजों के मारने के बाद भी वो ख़ुद को आज़ाद बताते रहे। जो वामवंथी संगठन का हिस्सा थे, जो जाति धर्म से ऊपर उठकर काम करते थे, इस धूर्त चोर ने उनको तिवारी जनेउधारी बनाकर एक जाति के साँचे में डाल दिया।
कभी किसी अंग्रेजी लेखक की कविता हिंदी में ट्रांसलेट कर ख़ुद की अपनी बना कर छाप देता है।
इस चोट्टे को क्या कहना चाहोगे आप?
आदेश हुआ है कि आज मंगलवार है,
अत: बजरंगबली के भजन प्रस्तुत किए जाएँ.
जो आज्ञा प्रभु!
Tune in now - youtu.be/CiwlhIiZtxc?si=fFNJ…
#JaiHanuman #HanumanKiBhujayien #JaiBajrangBali #ManojMuntashir #JaiShriRam
ओह भाई, 😂😂😂
ये तो अलग ही था कुछ, @ravish_journo क्या आपने भार्गव हिंदी शब्दकोश से ये जबरदस्त उपमा निकली थी 😂😂👇👇
भार्गव आदर्श हिंदी शब्दकोश में सहसा ‘अंकिल’ से सामना हो गया।
वाह @ravish_journo जी, क्या शब्द लाए हैं आप ह्वाट्सऐप अंकिलों के लिए!
🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣
आदिपुरुष में युग्वक्ता मनोज मूतशीर शुक्ला @manojmuntashir की कालजयी, अद्भुत संवाद लेखन के दृश्य देखकर, अब नमित मल्होत्रा वाली रामायण के लिए ख़ुद को तैयार कर सकते हो।
कमेंट में कोई धक्का मुक्की नहीं करेगा, एक एक करके अनुभव बतायेंगे 😊👇👇
जब मेरे दोस्त ने 10 वी क्लास में अपनी गर्लफ्रेंड को लेटर लिखा था, उसके लिरिक्स भी इससे बेहतर थे।😅
@niteshtiwari22 इतने बेहतरीन डायरेक्टर हो आप, दंगल जैसी मास्टरपीस बनाई है आपने। आपको ये बात समझ नहीं आई, किसी विदूषक के मसखरी करने और पौराणिक कथाओं के संवाद लिखने में फ़र्क़ होता है। ये आपने भी पढ़े होंगे, इसमें कुछ भी रामायण के स्तर का लग रहा है ? Chat GPT से मैं अगर अभी बोलूँ, राम सीता के धनुष यज्ञ और प्रथम मिलन पर इससे बहुत अच्छा लिख कर दे देगा। 😇 👇👇
चरन चोंच लोचन रंग्यो, चलै मराली चाल,
क्षीर-नीर बिबरन समय, बक उघरत तेहि काल।
इसका सीधा मतलब होता है, कोई कितना भी बकैती करके अपने को बड़ा ज्ञानी और विद्वान कवि समझे, जब आंकलन का समय आयेगा, सारी कलई खुल जाएगी।
मुझे हमेशा से पता था @DrKumarVishwas जैसे विदूषक को जबरदस्ती का कवि, विद्वान और अब तो ऋषि मर्मज्ञ पता नहीं क्या क्या घोषित किया जा रहा है। ये सिर्फ छद्म और मिथ्या आवरण है, इनकी मंचों पर कवि के रूप में मसखरी मैंने ध्यान से देखी है। जब 16-17 साल का लड़का था तो प्रभावित होता था, लेकिन अब थोड़ा पढ़ने के बाद मुझे पता लगा, ये एक घंटे की लाइव बकैती में 20 % भी अपनी पंक्तियां नहीं सुनाते, क्योंकि वो है नहीं इस स्तर की। ये उधर उधर से उठा कर उसमे अपने हावभाव का तड़का डाल कर टाइम पास करके चले जाते है।
अभी इनको रणवीर कपूर वाली रामायण में कुछ गीत लिखने को बुलाया गया, इन्होंने सच में लाइव परदे पर गोबर किया है कसम में।
“ये तेरा मेरा रंग है, हा रंग है, मंगल रंग है”.. ये गाना सुनना कभी, अगर इसको सिर्फ ऑडियो में सुनो और ए आर रहमान का म्यूजिक निकाल दो। ये रामायण के लिए राम सीता के लिए लिखा है, या कोई स्कूल के बेंच पर बैठकर 9 वी क्लास का लड़का अपनी गर्लफ्रेंड के लिए 😂 वो इससे बेहतर लिख देता। मैंने लिरिक्स का स्क्रीनशॉट लगाया है। जरा पढ़ कर बताना। 👇😊
अभी 4 नाम हटा लिए 😭😅 अभी धीरे धीरे इनकी भी पोल खोलूँगा। अब तेरे को सबके सामने मोर बना कर उड़ाऊँगा, तू यही रहना। तुझे क्या लगा डॉ अंबेडकर और फुले को बोलकर मुझे कॉर्नर कर देगा ? 😂 तेरे जैसे लोगो की ही पूछ मरोड़ने के लिए बैठा हुआ हूँ। अभी बोल रहा था कथा कहने के लिए 14 साल गुरुकुल में रहना पड़ता है, मैंने सारे कथावाचक की लिस्ट निकाल दी जो अभी सबसे महंगे और प्रसिद्ध है एक भी गुरुकुल में रहकर नहीं पढ़ा 14 साल। 👇👇 🤡
गालीबाज़ महोदय! आपकी माँ को प्रणाम 🙏
जाति व्यवस्था ब्राह्मणों की बनाई है सरनेम नहीं। सरनेम तो गाँव, पूर्वज, पद के हिसाब से भी बने होते है।
पहाड़ी ब्राह्मण अपने नाम के आगे गांव से जुड़ा सरनेम जोड़ते है, महाराष्ट्र और दूसरे प्रदेशों में भी ये परंपरा है । जैसे पोखरी गाँव से आए तो पोखिरयाल, थापली गाँव से निकले तो थपीलयाल। ऐसे हीं महाराष्ट्र में मंगेश गाँव से निकले तो मंगेशकर, सावरवाड़ी से आए तो सावरकर, अम्बावड़े गाँव से निकले तो अंबेडकर।
सरनेम और वर्ण और जाति में फ़र्क़ होता है भाई।
रवीन्द्र नाथ टैगोर ब्राह्मण होकर भी ठाकुर सरनेम लगाते थे, अब उनकी सरनेम चुराने वाला बोल दोगे ?
वर्मा भी वर्मन यानी कवच या रक्षा करने वाला, ये किसी को दी जाने वाली उपाधि थी। मध्यकाल में राजनीतिक उथल पुथल में और बाद में ब्रिटिश काल में बहुत से समुदाय सैनिक कार्य में जुड़ने लगे थे, पारंपरिक कार्य जोड़कर नए समुदाय आ रहे थे। सिख गुरु गोविंद सिंह ने किसान जातियों को सैनिक कुशलता देकर उनको मार्शल क़ौम में बदल दिया और उनको ‘सिंह’ सरनेम दिया। ऐसे ही अलग अलग समुदाय किसी ना किसी राजनीतिक घटनाक्रम का हिस्सा बने और अलग अलग सरनेम बनते गए। अब उनको लेकर टिप्पणी करना विशुद्ध मूर्खता है, और अज्ञानता है। @RGreat64525 तू भी अच्छे से पढ़ ले काम आयेगा जानकारी बढ़ेगी। नहीं तो बोलेगा दास तो शुद्र लिखते है और उड़ीसा और बंगाल में पीट दिया जाएगा ब्राह्मणों द्वारा। 🙂😅
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तेरा छठी का गौमूत्र बाहर आ जाएगा आज चिंता मत कर 😅
तू पहले मुझे बता, वर्मा तो सुनार भी लगाते है, उड़ीसा के ब्राह्मण भी, कायस्थ भी, कुर्मी, जाट बहुत से लोग। इसका मतलब होता है कवच यानी रक्षा करने वाला। ये एक टाइटल हुआ करता था। कोई सरनेम नहीं।
जैसे दास तूने बताया था शूद्रों का टाइटल है, पर उड़ीसा बंगाल में ब्राह्मण और कायस्थ भी लगाते है। इस पर तेरा एक जवाब नहीं निकल रहा मुंह से ? उड़ीसा और बंगाल के ब्राह्मणों ने शूद्रों का सरनेम चुरा लिया तेरे हिसाब से? @grok मेरी बात को प्रमाणित करो।
आजकल नीले कौवों का हाल कुछ ऐसा है को ना चित इनकी होती है ना पट
बड़े शोक से किसी मुद्दे पर आवाज उठाएंगे
पर हर बात grok से तथ्य मागने वाले धोती खुलता देखकर grok को भूल अनर्गल प्रलाप करते हुए
बड़ी ही निर्लज्जता के साथ दांत दिखने लगते है
भाई अभी शेरनी का दूध और पियो
फर्जी डॉ. तो नहीं हु किसी विषय में ,पर पंडित हु
इतिहास का
और घोर मनुवादी भी ।
तथ्य हो तभी आना
नहीं तो मुंह के बल ही गिरोगे
@grok रवीन्द्र नाथ टैगोर ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे, ये बात अलग है उनका परिवार ब्रह्मसमाज को मानता था तो पारंपरिक ब्राह्मण नहीं थे। पर वो लोग ठाकुर सरनेम लगाते थे। क्या इस मूर्ख @RGreat64525 के हिसाब से उन्होंने भी ठाकुर सरनेम चुरा लिया था ? 🙂




















