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नफ़रत भी कोई करने की चीज़ है? सब्र कीजिए, दया कीजिए, माफ़ कीजिए और जाने दीजिए। इतनी सस्ती नहीं है आपकी ज़िंदगी कि आप उसे नफ़रत करने में बर्बाद कर दें।
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इजरायल के रिजल्ट में ख़ुश होने जैसी कोई चीज़ नहीं है।
यहूदियों का नब्बे फ़ीसद वोट ज़ायनिस्ट पार्टियों को गया है जिनकी विचारधारा में बस इतना ही फ़र्क़ है कि कोई हर फ़लस्तीनी को मार देना चाहता है तो कोई सिर्फ़ विस्थापित कर देना चाहता है।
सेंटर लेफ़्ट यानी डेमोक्रेट्स को लगभग 9 फ़ीसद वोट मिले हैं तो अरब-इज़रायली बराबरी की बात करने वाले लेफ्ट को 0.9%।
तो एक पूरी तरह हत्यारी मानसिकता से ग्रस्त देश में यह उम्मीद करना कि सत्ता में कोई ऐसा आ जाएगा जो क्षेत्र में शांति लाने की बात करेगा, नादानी ही है।
अंदाज़ा लगाइए कि कोई अरब पार्टियों का सहयोग लेने को तैयार नहीं है कि उसके वोटर बिदक जाएँगे। कुल फ़लस्तीनियों के तक़रीबन 10 फ़ीसद को इज़रायली नागरिकता मिली है, वोट देने का अधिकार मिला है लेकिन वे भी बर्दाश्त नहीं हैं।
इस तरह फ़िलहाल नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री है और कल ईरान के कई इलाक़ों में बमबारी हुई है। अमरीका और इजरायल इंतज़ार में हैं कि ईरान पलटवार करे तो जंग दुबारा शुरू हो और ध्रुवीकरण के माहौल में आइजेनकोट का गठबंधन टूटे।
ट्रम्प को अपना और अपने दामाद का ख़रबो डॉलर का निवेश बचाना है तो इज़रायल से लेकर पूरे अरब वर्ल्ड में उसे अपने लोग चाहिए, डेमोक्रेसी नहीं।
4 नवंबर का इंतज़ार कीजिए और नोट कीजिए कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया अपने नागरिकों को ज़रूरी सामान इकट्ठा करके रखने के लिए कह चुके हैं।
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ये #Raaggiri का प्रयास है कि छोटे बच्चों को शास्त्रीय संगीत से डराने की बजाए उनके साथ रोचक तरीक़े से इसकी बातचीत हो। MS का मतलब MS Subbulakshmi हो, King Khan का मतलब उस्ताद बिस्मिल्ला खान हो, जय-वीरू की जोड़ी की तरह ही प्रचलित पं. राजन-साजन जी की जोड़ी हो।
@YRDeshmukh @hvgoenka
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आज PYRE सिनेमाघरों में रिलीज़ हो रही है।
आज का दिन मेरे लिए सिर्फ़ एक फ़िल्म की रिलीज़ नहीं, बल्कि लगभग आठ साल के सफ़र का पड़ाव है। उम्मीदें, सपने, संघर्ष और निराशाएँ। कई बार लगा कि PYRE के रूप में मैंने अपनी ही चिता बना ली है।
जून 2018 में मुनस्यारी में मेरी मुलाक़ात 84 साल के केसर सिंह जी और उनकी पत्नी से हुई थी। उनकी ज़िंदगी, अकेलापन और बेटे का इंतज़ार मुझे भीतर तक छू गया। उसी मुलाक़ात से PYRE की कहानी का जन्म हुआ।
मैंने तय किया कि इस कहानी को दुनिया के सामने लाना है। लेकिन कई स्टूडियो और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने यह कहकर मना कर दिया कि गाँव के लोगों, गैर-पेशेवर कलाकारों और एक बुज़ुर्ग दंपती की कहानी वाली फ़िल्म का आज कोई भविष्य नहीं है।
एक निर्माता तैयार हुए और शूटिंग शुरू हुई। लेकिन फ़िल्म पूरी होने से पहले ही उन्होंने हाथ खींच लिया और अपने पैसे वापस माँगे। मेरे सामने बड़ा संकट था।आख़िरकार मैंने अपनी सारी बचत, म्यूचुअल फ़ंड, ज़मीन और यहाँ तक कि कार भी बेच दी। किसी तरह निर्माता के पैसे लौटाए और फ़िल्म पूरी की।इस मुश्किल दौर में एक इंसान ने लगातार मेरा साथ दिया। नाम यहाँ नहीं लिख रहा, लेकिन जीवन भर उसका आभारी रहूँगा।
फ़िल्म पूरी हुई तो नई लड़ाई शुरू हुई-इसे फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स तक पहुँचाने की। एक सेल्स एजेंट ने दुनिया भर के फ़ेस्टिवल्स में फ़िल्म पहुँचाने का भरोसा दिया, लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। अब पूरी ज़िम्मेदारी मेरे और अरिंद्र राय चौधरी के कंधों पर थी। अरिंद्र ने पहली बार इस फ़िल्म पर भरोसा जताया था, तब वह सिर्फ़ 25 साल का था।
फिर ख़बर आई कि फ़िल्म का चयन दुनिया के प्रतिष्ठित 28th Tallinn Black Nights Film Festival में हो गया है। यह फ़िल्म का वर्ल्ड प्रीमियर था। वहाँ इसे Best Film – Audience Award भी मिला।
इसके बाद PYRE दुनिया के लगभग 28 अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में पहुँची और 18 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जिनमें 15 Best Film Awards शामिल हैं।
लेकिन इतने सम्मान के बावजूद भारत का कोई स्टूडियो या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म इस फ़िल्म को हाथ लगाने या रिलीज़ करने को तैयार नहीं था। दुनिया भर में प्यार मिला, लेकिन अपने ही देश में रिलीज़ का रास्ता नहीं मिल रहा था।
मैं हैरान और दुखी था। बार-बार सवाल उठता था कि जिस फ़िल्म को ऑस्कर विजेता संगीतकार माइकल डाना (MYCHAEL DANNA) का संगीत हो, जिसके लिए गुलज़ार साहब ने बिना किसी आर्थिक लेन-देन की बात किए गीत लिखा हो, जिसकी एडिटिंग में ऑस्कर विजेता जर्मन एडिटर पेट्रीशिया रोमल (PATRICIA ROMMEL) ने बिना पारिश्रमिक सहयोग किया हो और जिसे दुनिया भर में इतने पुरस्कार मिले हों, उसे भारत के स्टूडियो और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म क्यों नहीं अपना रहे हैं? आख़िर इस फ़िल्म में ऐसी क्या कमी है?
मेरे लिए PYRE धीरे-धीरे बुझती हुई चिता बनती जा रही थी। मुझे PYRE में अपनी चिता दिख रही थी।एक समय लगा कि शायद यह फ़िल्म कभी भारतीय दर्शकों तक नहीं पहुँचेगी। मैं भीतर से टूट चुका था। मानसिक, व्यक्तिगत और आर्थिक रूप से बहुत कुछ खो चुका था। कुछ नुक़सान ऐसे भी थे जिन्हें शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
लेकिन अरिंद्र ने हार नहीं मानी। उन्हीं की कोशिशों से लंदन में रहने वाले सुरेश जोशी तक फ़िल्म पहुँची। सुरेश जी फ़िल्म देखी और कहा, जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता-
“अगर मैंने इतनी सुंदर और ईमानदार फ़िल्म को सपोर्ट नहीं किया तो फिर जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”
और आज PYRE आपके सामने है।
आज यह फ़िल्म सिनेमाघरों तक पहुँची है तो इसका सबसे बड़ा श्रेय अरिंद्र और सुरेश जोशी को जाता है। दोनों का दिल से आभार। कुछ लोग आपके डूबते विश्वास को फिर से ज़िंदा कर देते हैं।
आज आप सबसे बस एक गुज़ारिश है।
कृपया PYRE देखने जाइए। अपने माता-पिता, परिवार और दोस्तों के साथ। यह एक बुज़ुर्ग दंपती के प्रेम, अकेलेपन, उम्र और बेटे के लौटने के इंतज़ार की कहानी है। हमारा theatrical release बहुत सीमित है, देश भर में करीब 80 screens पर।
यह फ़िल्म किसी बड़े बजट, बड़े सितारे या बड़े प्रचार के सहारे नहीं बनी। यह हिमालय के उन दो लोगों की कहानी है, जिन्होंने पहली बार कैमरे के सामने अभिनय किया और अपनी ज़िंदगी से इसे सच बना दिया।
आपका प्यार और साथ ही इस छोटी-सी फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त होगा।
फ़िल्म अच्छी लगे तो दोस्तों को बताइए और सोशल मीडिया पर साझा कीजिए। छोटी फ़िल्मों को दर्शकों तक पहुँचाने में आपकी भूमिका बहुत बड़ी हो सकती है।
कल तक यह मेरी फ़िल्म थी। आज से यह आपकी है।
मेरे आमा और बूबू को अपना प्यार दीजिएगा।
PYRE
IN CINEMAS TODAY
30 OCTOBER 2026
दिल से शुक्रिया। ❤️🙏
PS:
इस शोर के बीच भी
एक सन्नाटा है।
मेरा ईश्वर गवाह है।
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सुनो...
जब से इश्क़ हुआ है तुमसे, मैं खुद से भी मोहब्बत करने लगा हूँ। सच कहूँ तो पहले कभी अपनी परवाह नहीं की, कैसे दिखता हूँ, क्या पहनता हूँ, कैसा लगता हूँ... कभी सोचा ही नहीं। पर अब तुम्हारी वजह से खुद को संवारने लगा हूँ, खुद का ख्याल रखने लगा हूँ, क्योंकि अब मैं सिर्फ मेरा नहीं रहा, तुम्हारा भी हूँ।
ये मन्नतें माँगना मुझे कभी पसंद नहीं था, तुम्हें याद है मैं हमेशा कहता था कि मैं इन सब चीज़ों में यकीन नहीं करता... पर अब देखो ना, अब हर मंदिर में जा कर बस तुम्हें ही माँगने लगा हूँ मैं।मेरी हर सुबह तुम्हारे ख्याल से शुरू होती है, आँख खुलने से पहले ही तुम्हारा चेहरा सामने आ जाता है, और रात को आँख लगने तक बस तुम ही तुम रहती हो।
सुनो... क्या तुम्हें भी ऐसा कुछ महसूस होता है कभी? क्या तुम्हें भी ऐसा लगता है कि आसपास कोई नहीं है, सन्नाटा है, पर फिर भी तन्हाई नहीं लगती...क्योंकि अब दिल में तुम हो और कभी-कभी हजारों की भीड़ में भी खुद को बिल्कुल अकेला पाता हूँ, क्योंकि उस भीड़ में तुम जो नहीं होती।
सुनो… ये पागलपन सिर्फ मुझे ही होता है? कि तुम्हें भी होता हैं।तुम्हें पता है, अब तुम मुझे हर जगह दिखती हो।कहीं पे भी जाऊँ तुम ही तुम बस…कभी चाँदनी रात में चाँद को देखता हूँ तो उसमें तुम्हारा चेहरा नजर आता है। बारिश की बूंदें जब मेरे चेहरे पर गिरती हैं तो लगता है जैसे तुम मुझे छू रही हो।
सुबह-सवेरे पत्तों पर ठहरी हुई शबनम की बूंदें मुझे देख कर मुस्कुराती सी लगती हैं, जैसे तुम्हारी आँखें हों। हवा में जो मीठी सी खुशबू घुली होती है, बारिश के बाद मिट्टी से जो सोंधी महक आती है, उसमें भी न जाने क्यों हर बार तुम्हारा ही एहसास होता है।
मैंने कभी सोचा नहीं था कि इश्क़ ऐसा भी होता है, कि एक इंसान मेरी पूरी दुनिया बन जाएगा, पर अब हो गया है।
तो सुनो... अब इस इश्क़ की जिम्मेदारी तुम्हारी भी है।तो थोड़ा सा ख्याल रख लिया करो मेरा, जैसे मैं तुम्हारा रखता हूँ।✨❤️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
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शादी कोई छोटी बात होती है?
किसी को प्रेमहीन रिश्ते में धकेल देना प्यार नहीं, गैर-ज़िम्मेदारी है।
बेटियों को अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होने के लिए किसी रिश्ते में धकेल देना,
क्या सचमुच प्यार है?
शादी में एक लड़की का घर, लोग, रिश्ते और पूरी ज़िंदगी बदल जाती है। किसी को प्रेमहीन रिश्ते में डालना तनाव और अवसाद का कारण बन सकता है। सच्चा इंसान न खुद बंधन में रहना चाहता है, न किसी दूसरे की ज़िंदगी को बंधन में डालना चाहता है।
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ब्राज़ील में चुनाव हारने के बाद फ्लैवियो बोल्सनेरो परिवार के साथ देश छोड़ कर भाग गया.
सर्बिया का तानाशाह एलेक्सजेंडर वुचिच गोदी मीडिया, वोटर लिस्ट में हेरफेर, संस्थानों पर कब्जा करने के बावजूद हार गया.
अब सर्बिया के गोदी एंकर्स माफी मांग रहे हैं.
पूरी दुनिया की पॉलिटिक्स की स्क्रिप्ट जेन ज़ी लिख रहा है.
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तुम्हारा स्पर्श अभी भी मेरी त्वचा पर ठहरा हुआ है...
पता नहीं कैसे, तुम चले तो जाते हो, पर तुम्हारे हाथों की वो नरमी, तुम्हारी उंगलियों की वो गर्मी, वहीं की वहीं रह जाती है। जैसे मेरी त्वचा ने तुम्हें याद कर लिया हो, जैसे उसने तुम्हारा नाम लिख लिया हो। मैं आँखें बंद करती हूँ तो लगता है तुम फिर से छू रहे हो, धीरे से, बहुत प्यार से... और मैं उसी छुअन में फिर से खो जाती हूँ।
तुम्हारा स्वाद अभी भी मेरे होठों पर है...तुम्हारे होठों का वो मीठा सा एहसास, वो नशा, वो सुकून... सब अभी भी मेरे होठों पर बसा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे तुमने अपने होठों से मेरे होठों पर कोई कहानी लिख दी हो, जिसे मैं बार-बार पढ़ना चाहती हूँ। तुम्हारा नाम मेरे होठों पर नहीं, तुम्हारा एहसास मेरे होठों पर रहता है।
लगता हैं अभी भी हमारी साँसें आपस में उलझी हुई हैं...और जब तुम मेरे करीब होते हो तो साँसें भी अपना रास्ता भूल जाती हैं।मेरी साँस तुम्हारी साँस में, तुम्हारी साँस मेरी साँस में... पता ही नहीं चलता कि कौन सी साँस किसकी है। दो आत्माएं, एक ही चाहत में डूबी हुईं, एक ही ख्वाहिश में खोई हुईं। उस पल में न कोई दुनिया होती है, न कोई समय, बस एक एहसास होता है कि हम एक हैं। दो जिस्म नहीं, एक ही रूह के दो हिस्से... जो बिछड़ कर फिर से मिल गए हों।
तुम्हारी गर्माहट अभी भी मेरे भीतर जल रही है...तुम दूर चले जाते हो, पर तुम्हारी गर्माहट मुझ में छोड़ कर नहीं जाते.. वो मेरे सीने में, मेरे दिल में, मेरी धड़कनों में जलती रहती है। सर्द रातों में तुम्हारी यही गर्मी मुझे सुकून देती है, अकेलेपन में तुम्हारी यही गर्मी मुझे तुम्हारा होने का एहसास दिलाती है। तुम्हारे बिना भी मैं तुम्हें महसूस करती हूँ, क्योंकि तुम मेरे जिस्म से नहीं, मेरी रूह से मिले हो।
और यही तो प्रेम है न... जो शरीरों के अलग होने के बाद भी, आत्माओं को अलग नहीं होने देता।✨❤️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
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वाह है। क्या बात है? इतना सुरीला और जोशीला संगीत है कि आप ख़ुद को इसमें शामिल पाते हैं।
ये वीडियो सुरताल म्यूजिक एकेडमी लाहौर का है, लेकिन बिल्कुल अपना सा लगता है। इसीलिए कहते हैं न संगीत सरहदों को नहीं मानता।
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तस्लीमा नसरीन की यह कविता मुझे बहुत पसंद है-
प्रेम मुझे तोड़कर बुरी तरह टुकड़े-टुकड़े किए दे रहा है,
मैं अब मैं नहीं, मैं अब पहचान नहीं पा रही अपने को,
अपने शरीर को, अपने मन को, नहीं पा रही.
अपने घूमने-फिरने चलने को नहीं पा रही
देखने को भी नहीं,
कैसी भी तो विचित्र हुई जा रही हूं मैं, बंधुओं के अड्डे में
जब चाहिए हंसना, मैं हंस नहीं रही,
जब करना चाहिए दुःख, कर नहीं रही,
मन को प्रेम से हटाकर किसी और जगह क्षण भर को
भी नहीं कर पा रही स्थिर.
जगत भर में इस समय घिरता आया रहा है अन्धकार,
चांद-सूरज का ठिकाना नहीं, रात-दिन का ठिकाना नहीं,
मेरा जीवन गया, जीवन-यापन गया,
नाश हो गया.
अब यदि देना हो दुश्मन को अभिशाप, मैं
यह कहती नहीं जा तू हो जा कोढ़ी, मर जा तू,
तू मर जा.
अब मैं बड़े सहज भाव से देती हूं
यह कहकर अभिशाप- जा तू पड़ जा प्रेम में.
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Ty 😊 🤗 🥰 😘 🍫 🍫🍫👈♥
मिलना इन्हें गवारा नहीं मुझसे एक पल ,,,,
दिल जिनसे चाहता है शाम आे सहर मिलें...!!
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सुनो,
जब तुम मुझसे मिलने आओगे ना, तो सिर्फ मिलना मत...
मैं नहीं चाहती कि तुम आओ और बस सामने बैठ कर औपचारिक सी बातें कर लो। मैं चाहती हूँ जब तुम आओ, तो तुम्हारी आँखों में वही बेसब्री हो जो मेरी आँखों में बरसों से है।
आते ही मुझे अपनी बाहों में भर लेना, ऐसे जैसे तुम इसी लम्हे के लिए भटक रहे थे। तुम्हारी बाहें मेरी कमर के गिर्द कस जाएँ, इतनी कस कर कि मुझे तुम्हारे दिल की धड़कन अपनी धड़कन में घुलती हुई महसूस हो। तुम्हारी गर्म साँसें मेरी गर्दन को छुएँ, तुम्हारी खुशबू मेरे अंदर तक उतर जाए, और मैं खुद को भूल जाऊँ।
फिर धीरे से मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में भर लेना। मेरी आँखों में देखना, बहुत गहराई से देखना। देखना कि कैसे मैं तुम्हें देख कर शरमा जाती हूँ, मेरी पलकें झुक जाती हैं, मेरे गालों पर लाली आ जाती है, फिर भी मेरी नज़रें तुम्हें ही तलाशती हैं।
मेरे हाथ को थाम कर अपने होंठों से छू लेना, इतनी नर्मी से कि मेरी उंगलियाँ काँप जाएँ। मेरे माथे पर एक लंबा बोसा देना, जैसे कह रहे हो - तुम मेरी हो। फिर मेरे गालों को अपनी उंगलियों से सहलाना, मेरे बालों में अपनी उंगलियाँ फिराना।
उस पल कुछ मत सोचना, दुनिया को, लोगों को, वक्त को सब भूल जाना, बस मुझे महसूस करना। मुझे अपने सीने से इतना करीब खींच लेना कि हमारे बीच से हवा भी न गुज़र सके। मैं तुम्हारी बाहों में बिखर जाऊँगी, पिघल जाऊँगी, मेरी धड़कनें तुम्हारे नाम पर बेकाबू हो जाएँगी, और तुम... तुम बस मुझे थामे रहना, कस कर थामे रहना।
और काश वो लम्हा वहीं ठहर जाए।जहाँ न कोई घड़ी हो, न कोई शोर। सिर्फ तुम्हारी बाहें हों, मेरी टूटी-फूटी साँसें हों, और हमारा वो खामोश इश्क़, जो लफ्ज़ों के बिना भी सब कुछ कह दे।✨❤️
#રાધાસ્વરા
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वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे जानकी पुल पर अपनी आत्मकहानी धारावाहिक लिख रही हैं- ‘भाखै अकथ कथा बिरतांत’। आज उसकी तीसरी कड़ी में पढ़िए अल्मोड़ा में उनके नानी घर के क़िस्से और माँ शिवानी के जीवन में लेखन का संघर्ष। मृणाल जी ने बहुत सूक्ष्मता से समाज में स्त्री-पुरुष में किए जाने वाले भेदभाव को भी रेखांकित किया है- मॉडरेटर
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डेरे की कुलवधुएं
'लोकेशन नैनीताल।
-‘दीsss?’
बाबू के तबादलों के लंबे दौर के बाद अल्मोड़ा से शाहजहाँपुर, लखनऊ होते हुए हम वापिस नैनीताल आ गये हैं। हमारा नया घर भी सरकारी है, पुराने बंगलों से कहीं सुंदर हरा भरा और काफी बड़ा। अब तक भाई भी जनम गया है सो बीनू और मुझे यकीन है अब हमारा परिवार पूरा हो गया है। जिन जाड़ों में बोर्ड की परीक्षा सर पर होती हम निर्जन नैनीताल में ही बने रहते जहां सनीमा हॉल से लेकर होटल तक दो महीने को सो जाते। घर के बाहर इरू मिकी अपने अड़ोस-पड़ोस के हमउम्र बच्चों के साथ धूप में चकरघिन्नी बने फूल पत्तों के मुकुट बना कर राजा रानी बनते, या डोरी में बँधे पांगर (हॉर्स चेस्टनट) के भूरे गोलों से चेस्सी फाइट यानी चेस्टनट की काल्पनिक लड़ाई में मशगूल रहते। जिन जाड़ों में बोर्ड की परीक्षा सर पर होती हम निर्जन नैनीताल में ही बने रहते जहां सनीमाहॉल से लेकर होटल तक दो महीने को सो जाते। घर के बाहर इरू मिकी अपने अड़ोस पड़ोस के हमउम्र बच्चों के साथ धूप में चकरघिन्नी बने फूल पत्तों के मुकुट बना कर राजा रानी बनते, या डोरी में बँधे पांगर (हॉर्स चेस्टनट) के भूरे गोलों से चेस्सी फाइट यानी चेस्टनट की काल्पनिक लड़ाई में मशगूल रहते।'
(आगे पढ़ने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें)
@MrinalPande1
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अरे यार सुनो ना
तेरे कमरे के आईने को मैं ,,,,,,
दुश्मनों में शुमार करता हूं.....!!!
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ना रुकी वक़्त की गर्दिशें ना जमाना बदला.......
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*पेड़ सुखा तो परिंदों ने ठिकाना बदला 🥀💔
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अभी पूर्वी पर साइक्लोन अर्णब के लैंडफॉल की प्रोसेस जारी है। किसी भी चक्रवात के लैंडफॉल की प्रक्रिया काफी देर तक चलती है। साइक्लोन के दो महत्वपूर्ण हिस्से होते हैं। Eye और Eyewall... जहां Eyewalls चक्रवात का सबसे खतरनाक हिस्सा है वहीं Eye काफी शांत होती है .. देखिये पूरा वीडियो #CycloneArnab #CycloneUpdate #CycloneAlert
youtu.be/MaHVZV0gmag
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राकुल प्रीत सिंह के साथ ऐसा बार-बार क्यों होता है?
@grok क्या वह जानबूझकर इन पलों को सबके सामने लाती हैं, और ऐसा कितनी बार हुआ है? 🤔
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नास्तिकता, तर्कवाद और स्वतंत्र चिंतन: 60 महत्वपूर्ण पुस्तकें एवं उनके लेखक अगर आपकी नास्तिकता में गहरी रुचि है।
चरण 1: नास्तिकता की शुरुआत
1. एथीइज़्म: अ वेरी शॉर्ट इंट्रोडक्शन - जूलियन बैगिनी
2. वाई आई एम नॉट अ क्रिश्चियन - बर्ट्रेंड रसेल
3. लेटर टू अ क्रिश्चियन नेशन - सैम हैरिस
4. द गॉड डिल्यूज़न - रिचर्ड डॉकिन्स
5. गॉड इज़ नॉट ग्रेट - क्रिस्टोफर हिचेन्स
चरण 2: धर्म और धार्मिक मान्यताओं की आलोचना
1. द एंड ऑफ फेथ - सैम हैरिस
2. ब्रेकिंग द स्पेल: रिलिजन ऐज़ अ नेचुरल फिनॉमेनन - डैनियल सी. डेनेट
3. द पोर्टेबल एथीइस्ट - क्रिस्टोफर हिचेन्स
4. द एज ऑफ रीजन - थॉमस पेन
5. द मिरेकल ऑफ थीइज़्म: आर्ग्युमेंट्स फॉर एंड अगेंस्ट द एग्ज़िस्टेंस ऑफ गॉड - जे. एल. मैकी
चरण 3: ईश्वर के अस्तित्व पर दार्शनिक बहस
1. डायलॉग्स कन्सर्निंग नेचुरल रिलिजन - डेविड ह्यूम
2. एन इन्क्वायरी कन्सर्निंग ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग - डेविड ह्यूम
3. द प्रॉब्लम ऑफ पेन - सी. एस. लुईस
4. द एक्सपीरियंस ऑफ गॉड: बीइंग, कॉन्शसनेस, ब्लिस - डेविड बेंटली हार्ट
5. गॉड, फ्रीडम, एंड ईविल - एल्विन प्लांटिंगा
6. द एग्ज़िस्टेंस ऑफ गॉड - रिचर्ड स्विनबर्न
चरण 4: आलोचनात्मक चिंतन, तर्क और वैज्ञानिक पद्धति
1. द डेमन-हॉन्टेड वर्ल्ड - कार्ल सेगन
2. द स्केप्टिक्स' गाइड टू द यूनिवर्स - स्टीवन नोवेला एवं अन्य
3. एन इलस्ट्रेटेड बुक ऑफ बैड आर्ग्युमेंट्स - अली अल्मोसावी
4. थिंकिंग, फास्ट एंड स्लो - डैनियल काह्नमैन
5. वाई पीपल बिलीव वीर्ड थिंग्स - माइकल शरमर
6. द आर्ट ऑफ थिंकिंग क्लियरली - रोल्फ डोबेली
चरण 5: विकासवाद, जीवविज्ञान और विज्ञान
1. द सेल्फिश जीन - रिचर्ड डॉकिन्स
2. द ब्लाइंड वॉचमेकर - रिचर्ड डॉकिन्स
3. द ग्रेटेस्ट शो ऑन अर्थ - रिचर्ड डॉकिन्स
4. वाई इवोल्यूशन इज़ ट्रू - जेरी ए. कॉइन
5. ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ - चार्ल्स डार्विन
6. द मैजिक ऑफ रियलिटी - रिचर्ड डॉकिन्स
7. द ग्रैंड डिज़ाइन - स्टीफन हॉकिंग और लियोनार्ड म्लोडिनोव
चरण 6: धर्म की उत्पत्ति और मनोविज्ञान
1. रिलिजन एक्सप्लेंड - पास्कल बोयर
2. इन गॉड्स वी ट्रस्ट: द इवोल्यूशनरी लैंडस्केप ऑफ रिलिजन - स्कॉट एट्रन
3. द इवोल्यूशन ऑफ गॉड - रॉबर्ट राइट
4. द बिलीफ इंस्टिंक्ट - जेसी बेरिंग
5. ब्रेकिंग द स्पेल - डैनियल सी. डेनेट
चरण 7: नैतिकता: धर्म के बिना नैतिकता
1. द मॉरल लैंडस्केप - सैम हैरिस
2. प्रैक्टिकल एथिक्स - पीटर सिंगर
3. बीइंग गुड: अ शॉर्ट इंट्रोडक्शन टू एथिक्स - साइमन ब्लैकबर्न
4. द एथिकल ब्रेन - माइकल एस. गज़ानिगा
5. द गुड बुक: अ ह्यूमनिस्ट बाइबल - ए. सी. ग्रेलिंग
6. द निकोमेकियन एथिक्स - अरस्तू
चरण 8: अस्तित्ववाद, जीवन का अर्थ और मानवतावाद
1. एग्ज़िस्टेंशियलिज़्म इज़ अ ह्यूमनिज़्म - ज्याँ-पॉल सार्त्र
2. मैन्स सर्च फॉर मीनिंग - विक्टर ई. फ्रैंकल
3. द मिथ ऑफ सिसिफस - अल्बेर कामू
4. द स्ट्रेंजर - अल्बेर कामू
5. द लिटिल बुक ऑफ एथीइस्ट स्पिरिचुअलिटी - आंद्रे कॉन्त-स्पोंविल
6. ह्यूमनिज़्म: अ बिगिनर्स गाइड - पीटर केव
चरण 9: भारतीय दर्शन और नास्तिक परंपराएँ
1. इंडियन फिलॉसफी: अ वेरी शॉर्ट इंट्रोडक्शन - सू हैमिल्टन
2. एन इंट्रोडक्शन टू इंडियन फिलॉसफी - सतीशचंद्र चटर्जी एवं धीरेंद्रमोहन दत्ता
3. द एसेंस ऑफ बुद्धिज़्म - त्रालेग क्याबगोन
4. द बुद्धा एंड हिज धम्म - डॉ. बी. आर. आंबेडकर
5. फिलॉसफी ऑफ द बुद्धा - डेविड जे. कालूपहाना
6. एनिहिलेशन ऑफ कास्ट - डॉ. बी. आर. आंबेडकर
7. द गॉड मार्केट - मीरा नंदा
चरण 10: उन्नत दर्शन और धर्मनिरपेक्ष चिंतन
1. अ हिस्ट्री ऑफ वेस्टर्न फिलॉसफी - बर्ट्रेंड रसेल
2. द प्रॉब्लम्स ऑफ फिलॉसफी - बर्ट्रेंड रसेल
3. द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज़ - कार्ल पॉपर
4. ऑन लिबर्टी - जॉन स्टुअर्ट मिल
5. द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रिवोल्यूशन्स - थॉमस एस. कून
6. द राइटियस माइंड - जोनाथन हाइट
7. द मिरेकल ऑफ थीइज़्म - जे. एल. मैकी























